Tuesday, October 18, 2016

Hanuman Ji History

Lord Hanuman is well known for his extreme devotion to Lord Rama. Lord Hanuman is always depicted in the Indian folklaire as an icon of true devotion and a symbol of the power of true devotion and chastity.
Lord Hanuman's devotion to Lord Rama is symbolic of the devotion of the enlightened individual soul towards the supreme soul.
Many stories from the Indian literature tell the tales of Lord Hanuman protecting devotees of Lord Rama and helping those who seek his either spiritually or otherwise. Swami Tulasidas has written these lines in respect of Lord Hanuman's great character, in praise of his powers and also devotion.




Hanuman Ji History:







जब कुंवारे हनुमान जी को लड़ना पड़ा अपने ही पुत्र से
राकेश/इंटरनेट डेस्कUpdated Fri, 05 Jul 2013 09:19 AM IST
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महावीर हनुमान जी के विषय में यह सभी जानते हैं कि वह बालब्रह्मचारी हैं। भगवान राम की सेवा में लीन होकर इन्हानें शादी नहीं की। प्रश्न उठता है कि जब शादी नहीं की तो हनुमान जी का बेटा कहां से आया। हनुमान जी ने भी यही प्रश्न किया था जब उनका पुत्र सामने आया और बोला कि वह पवनपुत्र हनुमान का बेटा है। और जब इनके पुत्र ने प्रमाण दिया तो हनुमान जी को भी इस सत्य को स्वीकार करना पड़ा।
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यह कथा का उल्लेख बाल्मीकि रामायण में मिलता है। हनुमान जी जब लंका दहन कर रहे थे तब लंका नगरी से उठने वाली ज्वाला की तेज आंच से हनुमान जी पसीना आने लगा। पूंछ में लगी आग को बुझाने के लिए हनुमान जी समुद्र में पहुंचे तब उनके शरीर से टपकी पसीने की बूंद को एक मछली ने अपने मुंह में ले लिया।





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इससे मछली गर्भवती हो गयी। कुछ समय बाद पाताल के राजा और रावण के भाई अहिरावण के सिपाही समुद्र से उस मछली को पकड़ लाए। मछली का पेट काटने पर उसमें से एक मानव निकला जो वानर जैसा दिखता था। सैनिकों ने वानर रूपी मानव को पाताल का द्वारपाल बना दिया।

उधर लंका युद्घ के दौरान रावण के कहने पर अहिरावण राम और लक्ष्मण को चुराकर पाताल ले आया। हनुमान जी को इस बात की जानकारी मिली तब पाताल पहुंच गये।

यहां द्वार पर ही उनका सामना एक और महाबली वानर से हो गया। हनुमान जी ने उसका परिचय पूछा तो वानर रूपी मानव ने कहा कि वह पवनपुत्र हनुमान का बेटा मकरध्वज है। अब हनुमान जी और ज्यादा अचंभित हो गए। वो बोले कि मैं ही हनुमान हूं लेकिन मैं तो बालब्रह्मचारी हूं। तुम मेरे पुत्र कैसे हो सकते हो।

हनुमान जी की जिज्ञासा शांत करते हुए मकरध्वज ने उन्हें पसीने की बूंद और मछली से अपने उत्पन्न होने की कथा सुनाई। कथा सुनकर हनुमान जी ने स्वीकार कर लिया कि मकरध्वज उनका ही पुत्र है।

हनुमान ने मकरध्वज को बताया कि उन्हें अहिरावण यानी उसके स्वामी की कैद से अपने राम और लक्ष्मण को मुक्त कराना है। लेकिन मकरध्वज ठहरा पक्का स्वामी भक्त। उसने कहा कि जिस प्रकार आप अपने स्वामी की सेवा कर रहे हैं उसी प्रकार मैं भी अपने स्वामी की सेवा में हूं, इसलिए आपको नगर में प्रवेश नहीं करने दूंगा।


हनुमान जी के काफी समझाने के बाद भी जब मकरध्वज नहीं माना तब हनुमान और मकरध्वज के बीच घमासान युद्घ हुआ। अंत में हनुमान जी ने मकरध्वज को अपनी पूंछ में बांध लिया और नगर में प्रवेश कर गये। अहिरावण का संहार करके हनुमान जी ने मकरध्वज को भगवान राम से मिलवाया और भगवान राम ने मकरध्वज को पाताल का राजा बना दिया। 




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